SELECT MANDALA
SELECT SUKTA OF MANDALA 10
- 001
- 002
- 003
- 004
- 005
- 006
- 007
- 008
- 009
- 010
- 011
- 012
- 013
- 014
- 015
- 016
- 017
- 018
- 019
- 020
- 021
- 022
- 023
- 024
- 025
- 026
- 027
- 028
- 029
- 030
- 031
- 032
- 033
- 034
- 035
- 036
- 037
- 038
- 039
- 040
- 041
- 042
- 043
- 044
- 045
- 046
- 047
- 048
- 049
- 050
- 051
- 052
- 053
- 054
- 055
- 056
- 057
- 058
- 059
- 060
- 061
- 062
- 063
- 064
- 065
- 066
- 067
- 068
- 069
- 070
- 071
- 072
- 073
- 074
- 075
- 076
- 077
- 078
- 079
- 080
- 081
- 082
- 083
- 084
- 085
- 086
- 087
- 088
- 089
- 090
- 091
- 092
- 093
- 094
- 095
- 096
- 097
- 098
- 099
- 100
- 101
- 102
- 103
- 104
- 105
- 106
- 107
- 108
- 109
- 110
- 111
- 112
- 113
- 114
- 115
- 116
- 117
- 118
- 119
- 120
- 121
- 122
- 123
- 124
- 125
- 126
- 127
- 128
- 129
- 130
- 131
- 132
- 133
- 134
- 135
- 136
- 137
- 138
- 139
- 140
- 141
- 142
- 143
- 144
- 145
- 146
- 147
- 148
- 149
- 150
- 151
- 152
- 153
- 154
- 155
- 156
- 157
- 158
- 159
- 160
- 161
- 162
- 163
- 164
- 165
- 166
- 167
- 168
- 169
- 170
- 171
- 172
- 173
- 174
- 175
- 176
- 177
- 178
- 179
- 180
- 181
- 182
- 183
- 184
- 185
- 186
- 187
- 188
- 189
- 190
- 191
Rigveda – Shakala Samhita – Mandala 10 Sukta 073
A
A+
११ गौरिवीतिःशाक्त्यः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्।
जनि॑ष्ठा उ॒ग्रः सह॑से तु॒राय॑ म॒न्द्र ओजि॑ष्ठो बहु॒लाभि॑मानः ।
अव॑र्ध॒न्निन्द्रं॑ म॒रुत॑श्चि॒दत्र॑ मा॒ता यद्वी॒रं द॒धन॒द्धनि॑ष्ठा ॥१॥
द्रु॒हो निष॑त्ता पृश॒नी चि॒देवै॑: पु॒रू शंसे॑न वावृधु॒ष्ट इन्द्र॑म् ।
अ॒भीवृ॑तेव॒ ता म॑हाप॒देन॑ ध्वा॒न्तात्प्र॑पि॒त्वादुद॑रन्त॒ गर्भा॑: ॥२॥
ऋ॒ष्वा ते॒ पादा॒ प्र यज्जिगा॒स्यव॑र्ध॒न्वाजा॑ उ॒त ये चि॒दत्र॑ ।
त्वमि॑न्द्र सालावृ॒कान्त्स॒हस्र॑मा॒सन्द॑धिषे अ॒श्विना व॑वृत्याः ॥३॥
स॒म॒ना तूर्णि॒रुप॑ यासि य॒ज्ञमा नास॑त्या स॒ख्याय॑ वक्षि ।
व॒साव्या॑मिन्द्र धारयः स॒हस्रा॒ऽश्विना॑ शूर ददतुर्म॒घानि॑ ॥४॥
मन्द॑मान ऋ॒तादधि॑ प्र॒जायै॒ सखि॑भि॒रिन्द्र॑ इषि॒रेभि॒रर्थ॑म् ।
आभि॒र्हि मा॒या उप॒ दस्यु॒मागा॒न्मिह॒: प्र त॒म्रा अ॑वप॒त्तमां॑सि ॥५॥
सना॑माना चिद्ध्वसयो॒ न्य॑स्मा॒ अवा॑ह॒न्निन्द्र॑ उ॒षसो॒ यथान॑: ।
ऋ॒ष्वैर॑गच्छ॒: सखि॑भि॒र्निका॑मैः सा॒कं प्र॑ति॒ष्ठा हृद्या॑ जघन्थ ॥६॥
त्वं ज॑घन्थ॒ नमु॑चिं मख॒स्युं दासं॑ कृण्वा॒न ऋष॑ये॒ विमा॑यम् ।
त्वं च॑कर्थ॒ मन॑वे स्यो॒नान्प॒थो दे॑व॒त्राञ्ज॑सेव॒ याना॑न् ॥७॥
त्वमे॒तानि॑ पप्रिषे॒ वि नामेशा॑न इन्द्र दधिषे॒ गभ॑स्तौ ।
अनु॑ त्वा दे॒वाः शव॑सा मदन्त्यु॒परि॑बुध्नान्व॒निन॑श्चकर्थ ॥८॥
च॒क्रं यद॑स्या॒प्स्वा निष॑त्तमु॒तो तद॑स्मै॒ मध्विच्च॑च्छद्यात् ।
पृ॒थि॒व्यामति॑षितं॒ यदूध॒: पयो॒ गोष्वद॑धा॒ ओष॑धीषु ॥९॥
अश्वा॑दिया॒येति॒ यद्वद॒न्त्योज॑सो जा॒तमु॒त म॑न्य एनम् ।
म॒न्योरि॑याय ह॒र्म्येषु॑ तस्थौ॒ यत॑: प्रज॒ज्ञ इन्द्रो॑ अस्य वेद ॥१०॥
वय॑: सुप॒र्णा उप॑ सेदु॒रिन्द्रं॑ प्रि॒यमे॑धा॒ ऋष॑यो॒ नाध॑मानाः ।
अप॑ ध्वा॒न्तमू॑र्णु॒हि पू॒र्धि चक्षु॑र्मुमु॒ग्ध्य१स्मान्नि॒धये॑व ब॒द्धान् ॥११॥
जनि॑ष्ठा उ॒ग्रः सह॑से तु॒राय॑ म॒न्द्र ओजि॑ष्ठो बहु॒लाभि॑मानः ।
अव॑र्ध॒न्निन्द्रं॑ म॒रुत॑श्चि॒दत्र॑ मा॒ता यद्वी॒रं द॒धन॒द्धनि॑ष्ठा ॥१॥
द्रु॒हो निष॑त्ता पृश॒नी चि॒देवै॑: पु॒रू शंसे॑न वावृधु॒ष्ट इन्द्र॑म् ।
अ॒भीवृ॑तेव॒ ता म॑हाप॒देन॑ ध्वा॒न्तात्प्र॑पि॒त्वादुद॑रन्त॒ गर्भा॑: ॥२॥
ऋ॒ष्वा ते॒ पादा॒ प्र यज्जिगा॒स्यव॑र्ध॒न्वाजा॑ उ॒त ये चि॒दत्र॑ ।
त्वमि॑न्द्र सालावृ॒कान्त्स॒हस्र॑मा॒सन्द॑धिषे अ॒श्विना व॑वृत्याः ॥३॥
स॒म॒ना तूर्णि॒रुप॑ यासि य॒ज्ञमा नास॑त्या स॒ख्याय॑ वक्षि ।
व॒साव्या॑मिन्द्र धारयः स॒हस्रा॒ऽश्विना॑ शूर ददतुर्म॒घानि॑ ॥४॥
मन्द॑मान ऋ॒तादधि॑ प्र॒जायै॒ सखि॑भि॒रिन्द्र॑ इषि॒रेभि॒रर्थ॑म् ।
आभि॒र्हि मा॒या उप॒ दस्यु॒मागा॒न्मिह॒: प्र त॒म्रा अ॑वप॒त्तमां॑सि ॥५॥
सना॑माना चिद्ध्वसयो॒ न्य॑स्मा॒ अवा॑ह॒न्निन्द्र॑ उ॒षसो॒ यथान॑: ।
ऋ॒ष्वैर॑गच्छ॒: सखि॑भि॒र्निका॑मैः सा॒कं प्र॑ति॒ष्ठा हृद्या॑ जघन्थ ॥६॥
त्वं ज॑घन्थ॒ नमु॑चिं मख॒स्युं दासं॑ कृण्वा॒न ऋष॑ये॒ विमा॑यम् ।
त्वं च॑कर्थ॒ मन॑वे स्यो॒नान्प॒थो दे॑व॒त्राञ्ज॑सेव॒ याना॑न् ॥७॥
त्वमे॒तानि॑ पप्रिषे॒ वि नामेशा॑न इन्द्र दधिषे॒ गभ॑स्तौ ।
अनु॑ त्वा दे॒वाः शव॑सा मदन्त्यु॒परि॑बुध्नान्व॒निन॑श्चकर्थ ॥८॥
च॒क्रं यद॑स्या॒प्स्वा निष॑त्तमु॒तो तद॑स्मै॒ मध्विच्च॑च्छद्यात् ।
पृ॒थि॒व्यामति॑षितं॒ यदूध॒: पयो॒ गोष्वद॑धा॒ ओष॑धीषु ॥९॥
अश्वा॑दिया॒येति॒ यद्वद॒न्त्योज॑सो जा॒तमु॒त म॑न्य एनम् ।
म॒न्योरि॑याय ह॒र्म्येषु॑ तस्थौ॒ यत॑: प्रज॒ज्ञ इन्द्रो॑ अस्य वेद ॥१०॥
वय॑: सुप॒र्णा उप॑ सेदु॒रिन्द्रं॑ प्रि॒यमे॑धा॒ ऋष॑यो॒ नाध॑मानाः ।
अप॑ ध्वा॒न्तमू॑र्णु॒हि पू॒र्धि चक्षु॑र्मुमु॒ग्ध्य१स्मान्नि॒धये॑व ब॒द्धान् ॥११॥